Prerak Shayari – मैं अकेला ही चला था “जानिब-ए-मंज़िल” “

मैं अकेला ही चला था
“जानिब-ए-मंज़िल”
” मगर”
लोग साथ आते गये और “कारवाँ” बनता गया..

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